रांची. झारखंड का महापर्व सरहुल प्रकृति प्रेम और सांस्कृतिक विरासत के संगम के रूप में मनाया जा रहा है। आदिम काल से चली आ रही इस परंपरा में ‘सर’ (सखुआ फूल) और ‘हूल’ (क्रांति) का मिलन नवजीवन का संदेश देता है। जनजातीय समाज इसे नए साल के रूप में मनाता है, जहां धरती माता और सूर्य के विवाह का प्रतीक मानकर नई फसल का स्वागत किया जाता है।
परंपरा और मान्यताएं:
-
विभिन्न नाम: उरांव समुदाय इसे ‘खद्दी’, मुंडा ‘बा परब’ और संथाल समाज ‘बहा परब’ के नाम से मनाता है।
-
सखुआ पूजा: इस पर्व में साल (सखुआ) के वृक्ष की विशेष पूजा होती है। मान्यता है कि इसमें आराध्य देव निवास करते हैं।
-
वर्षा का अनुमान: पाहन (पुजारी) सरना स्थल पर रखे घड़े के जल स्तर को देखकर आने वाले मानसून और वर्षा का सटीक अनुमान लगाते हैं।
तीन दिवसीय उत्सव का स्वरूप: यह पर्व तीन चरणों में संपन्न होता है। पहले दिन घरों की शुद्धि और पाहन का उपवास होता है। दूसरे दिन मुख्य पूजा और ‘तहरी’ प्रसाद का वितरण किया जाता है। तीसरे दिन ‘फूल खोंसी’ की परंपरा होती है, जिसमें पाहन घर-घर जाकर सखुआ के फूल भेंट करते हैं। वर्तमान में यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मांदर की थाप और भव्य शोभायात्राओं के साथ सामाजिक एकता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।
