जमशेदपुर (श्याम झा). बड़े दावों और 30 साल के लंबे इंतजार के बाद 3 अक्तूबर 2025 को शुरू किया गया साकची का जिला पुलिस अस्पताल महज पांच महीनों में ही खुद ‘अवसाद’ का शिकार हो गया है। साकची शीतला मंदिर के पास स्थित इस अस्पताल की इमारत तो चमका दी गई है, लेकिन इसके भीतर न डॉक्टर हैं, न नर्स और न ही दवाइयां। स्थिति यह है कि करीब 10 लाख रुपये की लागत से हुए जीर्णोद्धार के बाद भी यह अस्पताल महज एक खाली शो-पीस बनकर रह गया है।
उद्घाटन के बाद भूला प्रशासन, खाली पड़े हैं बेड एसएसपी पीयूष पांडेय के निजी प्रयासों से इस खंडहर हो चुके अस्पताल का कायाकल्प किया गया था। चहारदीवारी से लेकर कमरों के रंग-रोगन और बेड की व्यवस्था तक सब कुछ दुरुस्त किया गया। 3 अक्तूबर को उद्घाटन के दिन कुछ पुलिसकर्मियों की जांच भी हुई, जिससे उम्मीद जगी थी कि अब जिले के 2,200 पुलिसकर्मियों को अपना अस्पताल मिलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि पांच महीने बीत जाने के बाद भी यहां एक भी स्थाई डॉक्टर, नर्स या कंपाउंडर की नियुक्ति नहीं हुई है। डॉक्टर का आलीशान चैंबर बना है, लेकिन कुर्सी महीनों से खाली पड़ी है।
सुविधा के नाम पर सिर्फ बिजली, जांच के लिए भटक रहे जवान अस्पताल में वर्तमान में सुविधा के नाम पर सिर्फ बिजली कनेक्शन है। यहां न तो खून जांच (Blood Test) की व्यवस्था है और न ही प्राथमिक उपचार के लिए जरूरी उपकरण। सिविल सर्जन कभी-कभार अस्पताल का दौरा जरूर करते हैं, लेकिन कुछ देर रुकने के बाद वापस लौट जाते हैं। वर्तमान में इसकी देखरेख की जिम्मेदारी ट्रैफिक डीएसपी को सौंपी गई है और सुरक्षा के लिए दो जवान तैनात हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर सन्नाटा पसरा है।
निजी अस्पतालों के भरोसे 2,200 पुलिस परिवार जिले के पुलिसकर्मियों में इस उदासीनता को लेकर गहरा रोष है। जवानों का कहना है कि वे 24 घंटे जनता की सुरक्षा में तैनात रहते हैं, लेकिन जब उनके और उनके परिवार के स्वास्थ्य की बात आती है, तो प्रशासन मौन हो जाता है। पुलिस अस्पताल की इस बदहाली के कारण आज भी जवानों को छोटे-बड़े इलाज के लिए महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। रोटरी क्लब जैसे संगठनों ने शुरुआती सहयोग जरूर किया, लेकिन सरकारी तंत्र की अनदेखी ने इस महत्वपूर्ण योजना को अधर में लटका दिया है।
