वॉशिंगटन/तेहरान. ईरान में जारी भीषण युद्ध को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं. अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय मध्यस्थ देशों का एक समूह 45 दिनों के अस्थायी संघर्षविराम (Ceasefire) की शर्तों पर चर्चा कर रहा है. हालांकि, इस शांति वार्ता के बीच युद्ध के और भी भयानक रूप लेने की आशंका गहरा गई है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को ‘पूर्ण विनाश’ की सीधी धमकी दी है.
45 दिनों का ‘टू-स्टेज’ शांति प्रस्ताव
एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं. प्रस्तावित समझौते के दो मुख्य चरण हैं:
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पहला चरण: 45 दिनों का तत्काल संघर्षविराम, जिसके दौरान स्थायी शांति के लिए रोडमैप तैयार किया जाएगा.
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दूसरा चरण: पूरे क्षेत्र में युद्ध की समाप्ति और एक व्यापक सुरक्षा समझौता. ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के अब्बास अराघची के बीच गुप्त संदेशों के जरिए बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सका है.
होर्मुज स्ट्रेट और यूरेनियम: पेच कहाँ फंसा है?
इस वार्ता में दो सबसे बड़े मुद्दे ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को खोलना और ईरान के यूरेनियम भंडार का निपटारा करना हैं. ईरान अपनी इन रणनीतिक ताकतों को केवल 45 दिनों के अस्थायी भरोसे पर छोड़ने को तैयार नहीं है. ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि वे गाजा या लेबनान जैसी स्थिति में नहीं फंसना चाहते, जहाँ समझौता होने के बाद भी हमले जारी रहें.
ट्रंप की ‘मंगलवार’ वाली डेडलाइन
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के लिए समय-सीमा (Deadline) को 20 घंटे और बढ़ा दिया है. अब यह समय-सीमा भारतीय समयानुसार मंगलवार (7 अप्रैल 2026) शाम तक है. ट्रंप ने बेहद सख्त लहजे में चेतावनी दी है:
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पावर प्लांट और पुल डे: ट्रंप ने कहा कि अगर मंगलवार तक होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोला गया, तो ईरान के हर पावर प्लांट और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जाएगा.
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तेल पर कब्जे की धमकी: उन्होंने स्पष्ट किया कि समझौता न होने की स्थिति में अमेरिका वहां सब कुछ तबाह करने और तेल क्षेत्रों पर कब्जा करने की योजना बना रहा है.
ईरान का कड़ा रुख
दूसरी ओर, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने पलटवार करते हुए कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति अब अमेरिका और इजरायल के लिए पहले जैसी कभी नहीं होगी. ईरान की इस बयानबाजी ने संघर्षविराम की उम्मीदों को कमजोर कर दिया है. राजनयिकों का मानना है कि यह अंतिम मौका है, यदि बातचीत विफल रही तो खाड़ी देशों के ऊर्जा और जल संयंत्र भी इस महायुद्ध की चपेट में आ सकते हैं.
