रांची. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत और मार्मिक पोस्ट साझा कर आदिवासी समाज की वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति पर गहरा सवाल खड़ा किया है. मुख्यमंत्री ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सदियों से संघर्ष करने वाले आदिवासियों के स्वाभिमान और उनके संवैधानिक हक के लिए दर-दर भटकने की विडंबना को लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बताया है.
संविधान और पहचान की लड़ाई पर सवाल
मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट में ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए लिखा कि जिस समुदाय ने अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके, वे आज अपनों के बीच ही पहचान के लिए तरस रहे हैं.
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ऐतिहासिक संघर्ष: उन्होंने संथाल हूल और भगवान बिरसा मुंडा के उलगुलान का उदाहरण देते हुए कहा कि औपनिवेशिक सत्ता को सबसे पहले चुनौती देने वाले समुदाय आज अपने ही संविधान के भीतर मान्यता और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
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विडंबना: हेमंत सोरेन ने इसे लोकतंत्र के आईने में एक कड़वी सच्चाई बताया कि रक्षकों को ही आज उपेक्षित रखा जा रहा है.
असम के आदिवासियों के लिए ‘पोस्टर अपील’
मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट के साथ तीन विशेष पोस्टर भी साझा किए हैं, जो मुख्य रूप से असम के चाय बागानों में रह रहे झारखंडी मूल के आदिवासियों को संबोधित करते हैं:
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त्रभाषी संदेश: हिंदी, असमिया और अंग्रेजी में जारी इन पोस्टरों के जरिए असम की धरती पर सदियों से रह रहे आदिवासियों से संवाद किया गया है.
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एसटी दर्जे की मांग: उन्होंने प्रमुखता से उठाया कि ब्रिटिश काल में चाय बागानों की अर्थव्यवस्था को अपने खून-पसीने से सींचने वाले आदिवासियों को असम में अब तक अनुसूचित जनजाति (ST) का संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है, जो एक ‘राष्ट्रीय अन्याय’ है.
न्याय और मजदूरी का मुद्दा
हेमंत सोरेन ने असम के मतदाताओं से राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर ‘न्याय, सम्मान और पहचान’ के लिए वोट करने की अपील की है. उन्होंने विशेष रूप से इन मुद्दों को रेखांकित किया:
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न्यूनतम मजदूरी: चाय बागान श्रमिकों के लिए कम से कम 500 रुपये दैनिक मजदूरी की मांग.
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संवैधानिक हक: असम में आदिवासियों को एसटी की मान्यता दिलाना.
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अन्य सुविधाएं: बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा, आवास और रोजगार सुनिश्चित करना.
मुख्यमंत्री ने असम के आदिवासियों से जेएमएम-जेबीपी (JMM-JBP) गठबंधन के उम्मीदवार को समर्थन देने की अपील करते हुए कहा कि जब तक समाज के इस वर्ग को न्याय नहीं मिलता, तब तक देश का लोकतंत्र अधूरा रहेगा.
