झारखंड के सारंडा में मारे गए नक्सली अनल दा की वो दो बेटियां, जिन्हें कभी नहीं मिला बाप का प्यार

झारखंड

झारखंड. भारत में एक पुरानी कहावत है, ‘पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय?’ इसका मतलब यह है कि अगर किसी का बेटा अच्छा बेटा है, तो उसे पैसा जमा करने की जरूरत नहीं है. और, अगर किसी का बेटा अच्छा नहीं है, तो उसे भी पैसा जमा करने की जरूरत नहीं है. नक्सली अनल दा उर्फ पतिराम मांझी पर कहावत की दूसरी लाइन पूरी तरह फिट बैठती दिखाई देती है. पतिराम मांझी आज से करीब 25 साल पहले गरीबी मिटाने के लिए घर से निकला था. लेकिन, इन 25 सालों में दुर्दांत नक्सली बनकर उसने खुद का वजूद ही मिटा लिया. नक्सली अनल दा ने भले ही अपने हाथों अपना अस्तित्व मिटा लिया, लेकिन उसकी उन दो बेटियों को क्या, जिन्हें बाप का प्यार नसीब न हुआ?

पतिराम मांझी उर्फ नक्सली अनल दा का घर झारखंड के गिरिडीह जिले के पीरटांड थाना क्षेत्र के झरहा गांव में है. घर में 80 साल की मां बड़की देवी, पिता छठू मांझी, पत्नी श्यामली और दो बेटी (रानी और नीलू) हैं. मां को मोबाइल के जरिए पतिराम मांझी उर्फ अनल दा के सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने की खबर मिली. पतिराम मांझी को उसकी मां बड़की देवी प्यार से नुनवा बोलती हैं. उसकी दो बेटियां रानी और नीलू को अपने पिता का चेहरा तक याद नहीं है. पत्नी श्यामली से जब पतिराम मांझी के बारे में बात करने की कोशिश की जाती है, तो वह फफक-फफककर रो पड़ती हैं. वह कहती हैं, ‘जीते जी इतने सालों में एक बार भी अपने पति से नहीं मिल पाई.’ वह कहती हैं कि उनकी दोनों बेटियों को यह भी पता नहीं है कि वे दोनों अपने पिता से कब मिली थी?

क्या कहती हैं मां बड़की देवी

नक्स्ली अनल दा उर्फ पतिराम मांझी की मां बड़की देवी से जब बात की गई, तब उन्होंने अपनी भाषा में कहा, ‘नुनवा निकललो त फिर वापस न आइलो. मोबाइल पर नुनवा के मरे के खबर सुन लियो.’ उनसे जब वृद्धा पेंशन के बारे में बात की गई, तब उन्होंने कहा कि उनको पेंशन नहीं मिलती है. इसका कारण यह है कि उनके पास बैंक खाता नहीं है.

प्रभात खबर की टीम ने जब नक्सली अनल दा उर्फ पतिराम मांझी की कहानी खोजने के लिए उसका गांव झरहा पहुंची, तब पता चला कि गांव में गमगीन माहौल है. लोग उसके शव के आने का इंतजार कर रहे हैं. गांव में कई ऐसे लोग भी मिले, जिन्होंने पतिराम मांझी को देखा नहीं है. लेकिन, हर कोई उसके कारनामों से वाकिफ है. गांव के लोग बताते हैं कि साल 1990 के आसपास पतिराम मांझी आसपास के सामंतवादियों महाजनों के खिलाफ चल रहे आंदोलनों से प्रभावित होकर नक्सली संगठन से जुड़ गया था. साल 1998 में उसकी शादी श्यामली देवी से हुई. इससे उसकी दो बच्चियां हैं. नक्सली गतिविधियों में शामिल होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. वह जेल से वापस आने पर पतिराम मांझी ने अपने घर में गरीबी का माहौल देखा. आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. पत्नी श्यामली बताती है कि साल 2002 में वह काम करने के बहाने घर से निकला, तो फिर वापस नहीं आया.

पतिराम मांझी उर्फ अनल दा भले ही एक करोड़ का इनामी नक्सली घोषित कर दिया गया, लेकिन उसके घर की आर्थिक स्थिति आज भी अच्छी नहीं है. घर की गरीबी मिटाने के लिए ही पतिराम मांझी ने घर छोड़ा था. लेकिन, उसने कभी मुड़कर यह नहीं सोचा कि घर छोड़ने के बाद उसकी पत्नी, बच्चे, मां-बाप कैसी जिंदगी जी रहे होंगे? वह पूरे 23 साल तक खून-खराबे और नक्सली गतिविधियों में करनामों पर कारनामा करता रहा. पतिराम मांझी की पत्नी श्यामली देवी बताती हैं कि उसके जाने के बाद मिट्टी का घर ढह गया. घर ढहने के बाद वह अपने बच्चों को लेकर देवर के पास चली गईं. श्यामली के दो देवर हैं. ये दोनों देवर खेती-बाड़ी करने के साथ मजदूरी भी करते हैं. उन्होंने इन्हीं दो देवरों के साथ रहते हुए अपनी दोनों बच्चियों को पाला-पोसा और बाद में उन दोनों की शादी भी की.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *