रांची के प्राइवेट स्कूलों में किताबों का ‘कमीशन खेल’: 120 करोड़ का टर्नओवर और अभिभावकों की जेब पर 36 करोड़ की चपत

झारखंड

रांची. राजधानी रांची में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के साथ ही अभिभावकों की जेब पर डाका डालने की तैयारी पूरी हो चुकी है। शिक्षा के नाम पर निजी स्कूलों और प्रकाशकों के बीच एक ऐसा ‘सिंडिकेट’ सक्रिय है, जो किताबों की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर सालाना 120 करोड़ रुपये का काला कारोबार कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस राशि में से करीब 36 करोड़ रुपये (30%) केवल कमीशन के तौर पर स्कूलों और बिचौलियों की जेब में जा रहे हैं।

NCERT बनाम प्राइवेट स्कूल: कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर आंकड़ों का विश्लेषण करें तो शिक्षा की बढ़ती लागत की डरावनी तस्वीर सामने आती है। जहां कक्षा 1 के लिए एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों का पूरा सेट मात्र 260 रुपये में उपलब्ध है, वहीं डीएवी स्कूलों में इसकी कीमत 517 रुपये और अन्य निजी स्कूलों में यह 3442 रुपये तक पहुंच गई है। यानी निजी प्रकाशकों की किताबें सरकारी किताबों की तुलना में 13 गुना तक महंगी बेची जा रही हैं।

दिसंबर से ही शुरू हो जाती है ‘लूट’ की स्क्रिप्ट खबर के मुताबिक, नए सत्र के लिए कमीशन का खेल दिसंबर माह से ही शुरू हो जाता है। निजी प्रकाशक और उनके डीलर स्कूलों से संपर्क कर 30 से 40 प्रतिशत तक का कमीशन तय करते हैं। कहीं-कहीं तो स्कूल प्रबंधन को ‘प्रोत्साहन’ के तौर पर विदेश यात्रा तक के ऑफर दिए जाते हैं। इसके बदले स्कूल प्रबंधन बुक लिस्ट में उन्हीं प्रकाशकों की किताबें शामिल करता है और अभिभावकों को चुनिंदा दुकानों से ही खरीदारी करने के लिए मौखिक या लिखित रूप से बाध्य किया जाता है।

कंटेंट वही, बस कवर और प्रकाशक बदल दिए अभिभावकों को पुरानी किताबें इस्तेमाल करने से रोकने के लिए प्रकाशक हर साल चालाकी बरतते हैं। किताबों का कंटेंट लगभग वही रहता है, लेकिन केवल कवर पेज या कुछ अध्यायों के क्रम बदलकर उसे ‘नया संस्करण’ बताकर बाजार में उतारा जाता है। मोरल साइंस, जीके और कंप्यूटर जैसे विषयों की पतली किताबों की कीमत भी 300 से 400 रुपये तक रखी जाती है, जिनमें पन्नों की संख्या नगण्य होती है।

रांची में किताबों का गणित:

  • कुल टर्नओवर: ₹120 करोड़ (सालाना)।

  • स्कूलों की संख्या: करीब 160 (CBSE/ICSE) और 400+ गैर-मान्यता प्राप्त।

  • सालाना वृद्धि: किताबों के दामों में हर साल 10 से 15% की बढ़ोतरी।

  • कमीशन का गणित: ₹100 की वास्तविक लागत वाली किताब अभिभावकों को ₹400 में बेची जा रही है, जिसमें 65% हिस्सा केवल कमीशन और मार्केटिंग का होता है।

अभिभावकों की बढ़ी चिंता मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों को पढ़ाना अब एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गया है। कक्षा 5 के छात्र के लिए मुख्य विषयों के अलावा 21 अतिरिक्त किताबें दी जा रही हैं, जिनका कुल बिल ₹7500 के पार जा रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन जानबूझकर एनसीईआरटी की सस्ती किताबों को नजरअंदाज कर निजी प्रकाशकों की महंगी रेफरेंस बुक थोप रहे हैं।

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