बोकारो. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और ‘कोल्हान टाइगर’ के नाम से मशहूर चंपई सोरेन गुरुवार (10 अप्रैल) को बोकारो पहुंचे. उन्होंने विस्थापित गांवों मोदीडीह और शिबुटांड में जनसंवाद कर हक-अधिकार के लिए एक बड़े आंदोलन का बिगुल फूंका. इस दौरान शिबूटांड में चंपई सोरेन ने खुद अपने हाथों से हल चलाकर प्रतीकात्मक रूप से जमीन पर विस्थापितों के हक का दावा पेश किया.
“वादे पूरे नहीं हुए तो खाली जमीन पर होगा अधिकार”
चंपई सोरेन ने बोकारो स्टील प्लांट (BSL) प्रबंधन और सरकार को सीधे शब्दों में चेतावनी दी.
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अधिग्रहण का मुद्दा: सोरेन ने कहा कि 1960 के दशक में करीब 34,000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन सेल (SAIL) ने केवल आधी जमीन पर ही प्लांट बनाया.
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जमीन वापसी की मांग: उन्होंने सवाल उठाया कि जब 60 वर्षों से हजारों एकड़ जमीन खाली पड़ी है और कंपनी उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रही, तो उसे रैयतों (मूल मालिकों) को क्यों नहीं लौटाया जा रहा?
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अल्टीमेटम: पूर्व सीएम ने कहा कि यदि विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो पूरे झारखंड से लाखों लोग आकर प्लांट की खाली पड़ी जमीन पर खेती शुरू करेंगे.
सरकारी रिकॉर्ड से ‘गायब’ हैं गांव
विस्थापितों की दयनीय स्थिति पर दुख जताते हुए सोरेन ने कहा कि विस्थापित परिवारों का नाम वोटर लिस्ट में तो है, लेकिन उनके गांव सरकारी रिकॉर्ड्स में नहीं हैं.
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प्रमाण पत्रों की समस्या: रिकॉर्ड से नाम गायब होने के कारण विस्थापितों को जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने तक में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
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मुआवजा और नौकरी: हजारों परिवारों को आज तक न तो उचित मुआवजा मिला है और न ही वादा की गई नौकरियां. इस दौरान अप्रेंटिस संघ ने भी उन्हें ज्ञापन सौंपकर रोजगार की मांग की.
जन आंदोलन से ही निकलेगा समाधान
चंपई सोरेन ने विस्थापित बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों से सीधा संवाद करते हुए कहा कि बिना लड़ाई के कोई समाधान नहीं निकलने वाला.
“जिस क्षेत्र से झारखंड आंदोलन शुरू हुआ और अलग राज्य के लिए संघर्ष हुआ, वहां के विस्थापित आज दर-दर भटक रहे हैं. अब सवाल पूछने का समय खत्म हुआ, अब समाधान के लिए कंधा से कंधा मिलाकर लड़ना होगा.”
इससे पहले बोकारो पहुंचने पर नयामोड़ में दर्जनों विस्थापितों ने चंपई सोरेन का जोरदार स्वागत किया. उनके इस रुख ने बोकारो स्टील सिटी में एक नए राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन की आहट दे दी है.
