रांची. झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) में इलाज की आस लेकर आने वाले मरीजों की मुश्किलें वार्ड तक पहुंचने से पहले ही दोगुनी हो जाती हैं. अस्पताल के टूटे हुए फर्श और जर्जर रास्तों के कारण स्ट्रेचर, ट्रॉली और व्हीलचेयर पर ले जाए जाने वाले गंभीर मरीज हर कदम पर जोरदार झटके खाने को मजबूर हैं. हैरानी की बात यह है कि रिम्स की यह बदहाली पिछले तीन वर्षों से लगातार बनी हुई है. 30 सितंबर 2023 को भी मीडिया द्वारा इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाए जाने के बावजूद अब तक धरातल पर स्थितियां जस की तस हैं.
वर्तमान में रिम्स के ओपीडी (OPD) में प्रतिदिन 2500 से अधिक और सेंट्रल इमरजेंसी में 275 से ज्यादा गंभीर मरीज पहुंचते हैं. इनमें से रोजाना 45 से 50 मरीजों को अलग-अलग वार्डों में शिफ्ट किया जाता है. सबसे बदतर स्थिति मेडिसिन और सर्जरी आईसीयू (ICU) के बाहर की है, जहां हर कदम पर उखड़े हुए फर्श मरीजों के घावों और दर्द को और बढ़ा रहे हैं.
सुविधाओं के नाम पर 1500 रुपये शुल्क, पर 32 कमरे पड़े हैं जर्जर
रिम्स में 28 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार 100 कमरों का पेइंग वार्ड आज रख-रखाव और सुविधाओं के अभाव में बदहाली के आंसू रो रहा है:
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कमरों का टोटा: सुविधाओं की कमी के कारण 100 में से वर्तमान में केवल 76 कमरे ही उपयोग के लायक बचे हैं, जबकि 32 कमरे पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं.
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बकाया सुविधाओं पर भारी शुल्क: रिम्स प्रशासन जर्जर व्यवस्था के बावजूद मरीजों से प्रति कमरा 1,500 रुपये प्रतिदिन का शुल्क वसूल रहा है. मरीजों के परिजनों का आरोप है कि कमरों की दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है, बाथरूम बेहद खराब स्थिति में हैं और कई कमरों में टीवी व फ्रिज जैसी बुनियादी सुविधाएं भी गायब हैं. पिछले दो सालों से यहां केवल मरम्मत का दावा किया जा रहा है.
पेइंग वार्ड का वर्तमान ढांचा
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ग्राउंड फ्लोर: कुपोषण का रेफरल सेंटर संचालित है.
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प्रथम तल्ला: सभी 24 कमरों में नेफ्रोप्लस का डायलिसिस सेंटर चल रहा है.
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दूसरा तल्ला: सिर्फ इसी फ्लोर का उपयोग निजी अस्पताल की तर्ज पर हो रहा है, जहां फिलहाल 5 से 6 मरीज भर्ती हैं.
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तीसरा तल्ला: इस फ्लोर के कमरों का उपयोग आयुष्मान भारत योजना के लाभार्थियों और इमरजेंसी से शिफ्ट होने वाले सामान्य मरीजों के लिए किया जा रहा है.
अधिकारियों का दावा: मरम्मत कार्य है जारी
रिम्स के पीआरओ (PRO) डॉ. शिशिर कुमार ने इस अव्यवस्था पर सफाई देते हुए कहा कि झारखंड स्टेट बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (JSBCCL) को भवन के जीर्णोद्धार का काम सौंपा गया है. फिलहाल निर्माण एजेंसी द्वारा पहले भवन के बाहरी पिलरों को मजबूत किया जा रहा है, जिसके बाद चरणबद्ध तरीके से अंदरूनी वार्डों की मरम्मत की जाएगी. पेइंग वार्ड के संदर्भ में उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग के निर्देशानुसार इसकी जिम्मेदारी भवन निर्माण विभाग को दी गई है और बेहतर स्थिति वाले कमरों में ही मरीजों को रखा जा रहा है. हालांकि, जमीन पर कम मजदूरों के कारण काम की रफ्तार बेहद सुस्त है, जिसका खामियाजा रोजाना सैकड़ों मरीज भुगत रहे हैं.
