गोड्डा. देश जहाँ एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डिजिटल क्रांति के दौर में तेजी से कदम बढ़ा रहा है, वहीं झारखंड के गोड्डा जिले से आई एक तस्वीर विकास के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत बयां कर रही है. जिले के बोआरीजोर प्रखंड अंतर्गत मेघी पंचायत के बड़ा केरा गांव में आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का घोर अकाल है. सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियों में जान जोखिम में डालनी पड़ती है. हाल ही में एक घायल पहाड़िया युवती को परिजनों द्वारा खाट पर ढोकर गांव पहुंचाने की घटना ने प्रशासनिक संवेदनहीनता को एक बार फिर उजागर कर दिया है.
छत से गिरकर गंभीर रूप से घायल हुई थी सुकुरमुनि पहाड़ीन
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बड़ा केरा गांव की रहने वाली 18 वर्षीय सुकुरमुनि पहाड़ीन कुछ दिन पूर्व साहिबगंज जिले के मंडरो प्रखंड स्थित डोरा गांव में अपने मामा के घर गई हुई थी:
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हादसे का शिकार: वहां रहने के दौरान वह अचानक घर की छत से नीचे गिर गई, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं.
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रांची में हुआ इलाज: परिजनों ने आनन-फानन में उसे साहिबगंज अस्पताल में भर्ती कराया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उसे बेहतर इलाज के लिए रांची रेफर कर दिया. रांची में लंबे इलाज के बाद जब उसकी स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ, तो परिजन उसे वापस घर लेकर लौटे.
भीषण गर्मी और धूप के बीच मेघी चौक से 4 किलोमीटर तक खाट का सहारा
मरीज के पिता डोमा पहाड़िया ने बताया कि रांची से एम्बुलेंस या वाहन के जरिए वे किसी तरह सुकुरमुनि को लेकर मेघी चौक तक तो पहुंच गए. लेकिन असली परीक्षा मेघी चौक पर आकर शुरू हुई:
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पैदल पगडंडी का रास्ता: मेघी चौक से उनके पैतृक गांव बड़ा केरा तक पहुंचने के लिए कोई भी संपर्क सड़क मौजूद नहीं है.
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कंधे पर लादा आशियाना: वाहन आगे जाने की स्थिति में नहीं था, जिसके बाद हार मानकर परिवार और गांव से बुलाए गए पुरुषों ने बांस की एक खाट (चारपाई) का इंतजाम किया.
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लाचारी का सफर: इस चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बीच ग्रामीण घायल युवती को खाट पर लिटाकर, कंधों के सहारे करीब 4 किलोमीटर दूर पथरीले और दुर्गम रास्तों से होते हुए गांव तक लेकर पहुंचे.
बड़ा केरा ही नहीं, दर्जनों पहाड़िया गांव सड़क से महरूम
स्थानीय नागरिकों के अनुसार, यह समस्या सिर्फ किसी एक गांव या परिवार की नहीं है. मेघी पंचायत के अंतर्गत आने वाले दर्जनों पहाड़िया बहुल गांव आज भी सड़क संपर्क से पूरी तरह कटे हुए हैं. इन सुदूर इलाकों में रहने वाले आदिम जनजाति परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन और रोजगार के लिए हर दिन मीलों पैदल सफर तय करना पड़ता है. सबसे ज्यादा परेशानी गर्भवती महिलाओं, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और बुजुर्गों को होती है, जिन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए ‘खाट स्ट्रेचर’ ही एकमात्र जरिया बचा है.
क्या कहते हैं जिम्मेदार और पीड़ित ग्रामीण?
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प्रशासनिक उदासीनता का आरोप: पीड़ित परिवार और ग्रामीणों ने रोष जताते हुए कहा कि गांव तक सड़क बनाने के लिए कई बार प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) से लेकर जिला मुख्यालय के आला अधिकारियों तक को लिखित आवेदन सौंपे गए हैं. चुनाव के समय नेता भी बड़े-बड़े वादे करके जाते हैं, लेकिन वोट बैंक का इस्तेमाल होने के बाद आज तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई.
मनोज मरांडी (मुखिया, मेघी पंचायत): “हमारी पंचायत के दर्जनों पहाड़िया गांवों की स्थिति वाकई बेहद चिंताजनक है. सड़क निर्माण को लेकर मैंने खुद कई बार जिला प्रशासन और संबंधित विभाग को पत्र लिखा है, लेकिन अब तक ऊपर से कोई सकारात्मक कार्रवाई या फंड की स्वीकृति नहीं मिली है. सबसे ज्यादा डर बरसात के मौसम में लगता है. मॉनसून के दौरान इन कच्चे रास्तों पर भारी कीचड़ हो जाता है, जिससे पैदल चलना भी दूभर हो जाता है. उस समय अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे समय पर अस्पताल पहुंचाना लगभग असंभव हो जाता है.”
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