रांची. झारखंड की राजधानी रांची से महज 20 किलोमीटर और प्रखंड मुख्यालय से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हाहाप पंचायत का कोयरीबेड़ा गांव सूबे के विकास के तमाम दावों और सरकारी विज्ञापनों की पोल खोल रहा है. जून महीने की शुरुआत के साथ ही सूर्य की तपिश और पारा 41 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, लेकिन इस भीषण गर्मी में भी यहाँ के ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं. आजादी के दशकों बाद भी कोयरीबेड़ा गांव सड़क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह महरूम है.
गले नहीं उतरता विकास का दावा: खराब पड़े हैं सभी जलमीनार और हैंडपंप
कोयरीबेड़ा गांव में सभी टोलों को मिलाकर लगभग 100 घरों की आबादी है, जिसमें 500 से अधिक ग्रामीण निवास करते हैं. पानी की किल्लत सरकारी तंत्र की घोर संवेदनहीनता को दर्शाती है:
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दिखावे का ढांचा: गांव में सरकार की ओर से तीन और सीसीएल (CCL) की ओर से एक जलमीनार लगाई गई है, साथ ही आधा दर्जन हैंडपंप भी गाड़े गए हैं. मगर सच्चाई यह है कि देखरेख के अभाव में वर्तमान में सभी जलमीनार और हैंडपंप पूरी तरह खराब हैं.
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चुआं और दूषित नदी पर निर्भरता: सुबह होते ही महिलाएं और बच्चे सिर पर डेकची और बाल्टी लेकर पगडंडियों के रास्ते पानी की तलाश में निकल जाते हैं. पूरी आबादी पीने के पानी के लिए कुआं नुमा ‘चुआं’ और नहाने-धोने के लिए ‘दाडी’ (डोभा) तथा एक किलोमीटर दूर बहने वाली ग्रामीण नदी के दूषित पानी पर निर्भर है.
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पशु और इंसान एक घाट: सबसे दर्दनाक स्थिति यह है कि जिस दाडी (डोभा) के गंदे पानी का इस्तेमाल ग्रामीण अपनी प्यास बुझाना और खाना पकाने में करते हैं, उसी में मवेशी (जानवर) भी पानी पीते हैं.
सड़क जर्जर: शिलान्यास का पत्थर तोड़ा, बीमारों को खटिया पर ढोने की मजबूरी
हाहाप के सरवल से कोयरीबेड़ा होते हुए रुडुंगकोचा, बुंडू बेड़ा, बुतियो, नचलदाग, तुंजू को जोड़ने वाली मुख्य संपर्क सड़क पूरी तरह से जर्जर और जानलेवा हो चुकी है:
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अधूरा शिलान्यास: दो साल पहले चुनाव से ठीक पहले स्थानीय विधायक ने इस सड़क के सुदृढ़ीकरण के लिए सरवल में शिलान्यास का पत्थर गाड़ा था, लेकिन काम आज तक शुरू नहीं हुआ. जनप्रतिनिधि की इस बेरुखी से नाराज ग्रामीणों ने गुस्से में आकर उस शिलान्यास पट्ट को ही तोड़ दिया.
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गांव नहीं पहुंचती गाड़ी: कोयरीबेड़ा के बारु टोली में स्थिति और भी भयावह है, जहाँ सड़क का नामोनिशान नहीं होने के कारण कोई भी चार पहिया वाहन या एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती. जब भी गांव में कोई बीमार पड़ता है या गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है, तो ग्रामीण उसे खटिया (चारपाई) पर लादकर पैदल ही मुख्य सड़क तक लाते हैं.
24 घंटे में महज 4 घंटे बिजली; पोलिंग बूथ पर भी अंधेरा
मुख्यमंत्री के ग्रामीण इलाकों में 12 से 15 घंटे निर्बाध बिजली देने के कड़े निर्देशों के बावजूद कोयरीबेड़ा में बिजली की घोर आंख-मिचौली जारी है:
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भगवान भरोसे बिजली: गांव में पूरे दिन में बमुश्किल 4 से 5 घंटे ही बिजली दर्शन देती है. हल्के आंधी-तूफान या तेज हवा चलने पर भी जो बिजली काटी जाती है, वह दोबारा कब आएगी, इसका कोई अता-पता नहीं रहता.
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वैकल्पिक बूथ व्यवस्था: लोकसभा, विधानसभा या पंचायत चुनाव के वक्त इस गांव के ‘नव प्राथमिक विद्यालय’ को मतदान केंद्र (बूथ नंबर 254) बनाया जाता है, लेकिन इस बूथ पर भी स्थायी रूप से सड़क, पानी या बिजली का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है; चुनाव के दिन केवल कामचलाऊ व्यवस्था की जाती है.
क्या कहते हैं जिम्मेदार और पीड़ित ग्रामीण?
नाने कच्छप उर्फ नन्हे कच्छप (मुखिया, हाहाप पंचायत): “मुखिया के अधिकार और फंड बेहद सीमित हैं. पूरे पंचायत के खराब हैंडपंपों और जलमीनार की सूची बनाकर पेयजल एवं स्वच्छता विभाग और प्रखंड कार्यालय को कई बार लिखित आवेदन दिया गया, अधिकारियों को फोन किया गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. गांव में सड़क न होने के कारण दो बार बोरिंग करने वाली बड़ी गाड़ियां वापस लौट गईं. मैंने अपने फंड से केवल गार्डवाल बनवाया है.”
हरीश कुमार गंझू (ग्राम प्रधान): “राजस्व ग्राम होने के बावजूद कोयरीबेड़ा को अनाथ छोड़ दिया गया है. सांसद और विधायक केवल चुनाव के समय वोट मांगने या किसी खास कार्यक्रम में चेहरा दिखाने आते हैं, गांव के विकास के लिए उनका प्रयास शून्य है. ग्रामसभा से पारित प्रस्ताव फाइलों में दबकर ठंडे बस्ते में चले गए हैं.”
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ग्रामीणों का दर्द (सीता देवी, विजय गंझू, सुदर्शन गंझू): “हमें दूषित पानी पीने की आदत हो गई है, जिससे बच्चे लगातार बीमार पड़ते हैं. ऐसा लगता ही नहीं कि हम झारखंड की राजधानी रांची के पास रह रहे हैं. नेताओं को सिर्फ वोट से मतलब है.”
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जुली देवी (65 वर्ष): “शादी होकर जब इस गांव में आई थी, तब से चुआं का ही पानी पी रही हूं. मेरी आधी से ज्यादा जिंदगी ऐसे ही नरक में बीत गई, लेकिन अब हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए तो कुछ बेहतर होना चाहिए.”
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मंजू कुमारी (युवती): “पानी, सड़क और बिजली की इस घोर समस्या का सीधा असर हमारी शादियों पर पड़ रहा है. गांव की दुर्दशा देखकर कोई भी मेहमान या रिश्तेदार यहाँ आने से परहेज करता है. लड़की वाले इस गांव के लड़कों से अपनी बेटी की शादी करने से कतराते हैं, जिससे युवाओं का भविष्य भी संकट में है.”
