सारठ. झारखंड राज्य गठन के 26 वर्षों के उपरांत भी देवघर जिले के सारठ प्रखंड अंतर्गत लगवां पंचायत से सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की पोल खोलती एक मर्मांतक तस्वीर सामने आई है. बगजोरिया और पीठलापुल गांव के बीच झाड़ियों के बीच मिट्टी के एक छोटे से कच्चे मकान में सोनू मरांडी का छह सदस्यीय आदिवासी परिवार अत्यंत गरीबी, भुखमरी और बेबसी के साये में जीने को मजबूर है.
चार बच्चों संग बोरे पर सोने और अधपेट रहने की मजबूरी
सोनू मरांडी मजदूरी कर किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं, पर स्थिति बेहद चिंताजनक है:
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पहनने को कपड़े नहीं: सोनू की पत्नी रौशनी हांसदा के अनुसार, उनके चार छोटे बच्चे (सकल 10 वर्ष, फुलमुनि 8 वर्ष, मीरु 5 वर्ष और मंजू 2 वर्ष) हैं, जिनके पास पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं हैं. बच्चे शिक्षा व पोषण से पूरी तरह वंचित हैं.
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एक ही साड़ी का सहारा: रौशनी हांसदा ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि उनके पास पहनने के लिए महज एक साड़ी है, जिसे वे रोज धोकर सुखाती हैं और पहनती हैं. परिवार के पास सोने के लिए एक खाट तक नहीं है; पूरा परिवार जमीन पर बोरा बिछाकर सोता है.
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पति की शराब की लत: पति मजदूरी तो करते हैं, लेकिन शराब की लत के कारण अक्सर कमाई का पैसा घर नहीं पहुंच पाता, जिससे कई रातें परिवार को भूखे पेट बितानी पड़ती हैं.
राशन, अबुआ आवास और मंईयां सम्मान योजना से वंचित
पहल और दावों के बावजूद इस परिवार तक एक भी सरकारी योजना का लाभ नहीं पहुंचा है:
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बुनियादी सुविधाएं नदारद: परिवार का आज तक न तो राशन कार्ड बना है और न ही उन्हें प्रधानमंत्री आवास या राज्य सरकार की अबुआ आवास योजना का लाभ मिला है.
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मंईयां सम्मान योजना भी नहीं: 27 वर्षीया रौशनी हांसदा को अब तक ‘झारखंड मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना’ की राशि भी नहीं मिल सकी है.
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल, जनप्रतिनिधि ने दिया मदद का आश्वासन
शिमला पंचायत के पंचायत समिति सदस्य रघुनंदन सिंह ने स्वीकार किया कि उन्हें इस परिवार की अत्यंत दयनीय स्थिति की पूरी जानकारी है. उन्होंने कहा कि वे अपने स्तर से इस परिवार को राशन कार्ड, आवास व अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए प्रशासनिक प्रयास कर रहे हैं.
यह मामला इस बात पर गंभीर सवाल खड़े करता है कि आखिर सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े सबसे जरूरतमंद परिवारों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है.
