गढ़वा में स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही: भीषण गर्मी में उबलते हुए रक्तदान करने को मजबूर रक्तदाता; वजन करने वाली मशीन गायब, अंदाज पर हो रहा खेल

झारखंड

गढ़वा. एक तरफ सरकार और स्वास्थ्य विभाग बड़े-बड़े विज्ञापन जारी कर आम जनता से बढ़-चढ़कर स्वैच्छिक रक्तदान (Blood Donation) करने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ झारखंड के गढ़वा जिला मुख्यालय स्थित सदर अस्पताल के ब्लड बैंक की अपनी व्यवस्था ही इन दिनों ‘वेंटिलेटर’ पर नजर आ रही है. रिकॉर्ड तोड़ भीषण गर्मी और उमस के बीच ब्लड बैंक के एयर कंडीशनर (AC) और पंखे लंबे समय से ठप पड़े हैं. स्थिति इतनी नारकीय हो चुकी है कि अपनी मर्जी से दूसरों की जान बचाने आने वाले रक्तदाताओं और गंभीर मरीजों को पसीने से तरबतर होकर अत्यंत गर्म वातावरण में उबलते हुए रक्तदान करना पड़ रहा है.

जीवन रक्षक उपकरणों का टोटा: जमीन पर अंदाज से भरा जा रहा ब्लड बैग

गढ़वा ब्लड बैंक में सिर्फ बुनियादी सुविधाओं (हवा-पानी) की ही किल्लत नहीं है, बल्कि चिकित्सकीय मानकों और जीवन रक्षक उपकरणों की भी भारी कमी देखी जा रही है:

  • वजन मशीन गायब: रक्तदाताओं से मिली तकनीकी जानकारी के मुताबिक, रक्त संग्रह (Blood Collection) के समय ब्लड बैग के सटीक वजन और शरीर से निकलने वाले खून की तय मात्रा की निगरानी करने वाली आवश्यक डिजिटल मशीन ही यहाँ उपलब्ध नहीं है.

  • मेडिकल मानकों की अनदेखी: मशीन के अभाव में स्वास्थ्य कर्मी नीचे जमीन पर ही ब्लड बैग को रखकर महज एक मोटे अनुमान (अंदाज) के आधार पर खून भर रहे हैं. मेडिकल साइंस के लिहाज से यह बेहद संवेदनशील और गंभीर लापरवाही है, जो रक्तदाता और रक्त पाने वाले मरीज दोनों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है.

“अगर कोई रक्तदाता बेहोश हो जाए, तो कौन लेगा जिम्मेदारी?” – अतुलधर दुबे

ब्लड बैंक की इस बदहाली और प्रशासनिक संवेदनहीनता को लेकर क्षेत्र के नियमित रक्तदाताओं में गहरा आक्रोश है:

अतुलधर दुबे (नियमित रक्तदाता): “हम लोग जागरूक नागरिक होने के नाते साल भर समाज के युवाओं को रक्तदान करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन गढ़वा ब्लड बैंक के भीतर की स्थिति लोगों को डराने वाली है. केंद्र के भीतर न तो पंखे चल रहे हैं और न ही एसी काम कर रहा है. मेडिकल नियम कहते हैं कि रक्तदान करने के तुरंत बाद डोनर के शरीर को आराम और ठंडे वातावरण की सख्त जरूरत होती है. इस चिलचिलाती उमस और भीषण गर्मी में अगर कोई रक्तदाता कमजोरी के कारण अचानक बेहोश होकर गिर जाए और उसे कोई गंभीर चोट आ जाए, तो इसकी जिम्मेदारी कौन सा अधिकारी लेगा?”

जागरूकता अभियानों की खुली पोल, खून की किल्लत का खतरा

स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं और संवेदनशील उपकरणों के इस घोर अभाव के कारण अब आम लोग और स्वैच्छिक रक्तदाता इस चिलचिलाती गर्मी में सदर अस्पताल के रक्तदान केंद्र की ओर रुख करने से कतराने लगे हैं. अगर यह सिलसिला कुछ दिन और जारी रहा, तो गढ़वा ब्लड बैंक में अचानक खून का अकाल (किल्लत) पड़ सकता है, जिसका सीधा खामियाजा थैलेसीमिया पीड़ितों, गर्भवती महिलाओं और सड़क हादसों में घायल मरीजों को भुगतना पड़ेगा.

विभागीय सूत्रों के अनुसार, ब्लड बैंक की इस दुर्दशा और तकनीकी खराबी की लिखित जानकारी संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को काफी पहले ही मुहैया करा दी गई थी, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी इसे दुरुस्त करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. स्वास्थ्य महकमे का यह उदासीन रवैया सरकार के दावों की हवा निकाल रहा है. अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद जिला प्रशासन और सिविल सर्जन कब तक अपनी नींद से जागते हैं.

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