पलामू में करोड़ों की उत्तर कोयल नहर परियोजना पर उठे सवाल: निर्माण के 1 महीने के भीतर पुल में दिखीं दरारें; ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, लीपापोती का आरोप

झारखंड

पलामू. झारखंड के पलामू जिले में करोड़ों रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रही महत्वाकांक्षी ‘उत्तर कोयल जलाशय परियोजना’ एक बार फिर अपने निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर विवादों और सवालों के घेरे में है. हुसैनाबाद थाना क्षेत्र के दरुआ बेनी पंचायत के पास मुख्य नहर (आरडी 84.846) पर बनाए जा रहे पुल सह सुपर पैसेज (Super Passage) में निर्माण के महज एक महीने के भीतर ही बड़ी-बड़ी दरारें (Cracks) उभरने का सनसनीखेज दावा किया गया है. इस लापरवाही को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और किसानों में कार्य एजेंसी के खिलाफ भारी आक्रोश है. नाराज ग्रामीणों ने पुल की इस खस्ताहाल स्थिति का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया है और भारत व राज्य सरकार के मंत्रियों सहित पलामू के जनप्रतिनिधियों से इसकी उच्च स्तरीय जांच कराने की गुहार लगाई है.

मिट्टी भरकर कर दी गई थी ढलाई, सेटरिंग हटते ही खुली पोल: ग्रामीण

परियोजना के निर्माण कार्य में लगे ठेकेदारों और अभियंताओं पर स्थानीय लोगों ने तकनीकी मानकों की सरेआम अनदेखी करने का सीधा आरोप लगाया है:

  • गलत तकनीकी प्रक्रिया: ग्रामीणों का कहना है कि पुल के निर्माण के समय सेटरिंग के नीचे मजबूत सपोर्ट देने के बजाय सीधे मिट्टी भरकर ढलाई का काम पूरा कर दिया गया था.

  • दरारें छिपाने की कोशिश: बाद में जब सेटरिंग के नीचे से उस मिट्टी को हटाया गया, तो कुछ ही घंटों के भीतर पुल का पूरा ढांचा लोड नहीं सह पाया और उसमें दरारें आ गईं. ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण एजेंसी ने इन तकनीकी कमियों को सुदृढ़ करने के बजाय दरारों के ऊपर सीमेंट और कंक्रीट की केवल लीपापोती (पैचवर्क) कर मामले को दबाने का प्रयास किया है.

किसानों की जीवनरेखा पर खतरा; स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से जांच की मांग

पुल की बदहाली का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद पलामू प्रमंडल के किसानों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ गई है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के वरिष्ठ नेता सह पूर्व प्रत्याशी शेर अली, किसान भुनेश्वर सिंह, पूर्व जिला परिषद प्रत्याशी मिथिलेश कुमार सिंह तथा दरुआ पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि योगेंद्र सिंह ने संयुक्त रूप से सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है.

नेताओं और किसानों का साझा बयान: “उत्तर कोयल जलाशय परियोजना पलामू और इसके आस-पास के सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों के लिए एक जीवनरेखा (Lifeline) है. यदि इसके शुरुआती चरण में ही पुल और नहर के ढांचे इस तरह टूटने लगेंगे, तो पानी के भारी दबाव के समय भविष्य में कोई भी बड़ा और जानलेवा हादसा हो सकता है. सरकार को तुरंत किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष तकनीकी एजेंसी (Independent Technical Agency) को भेजकर पूरे निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच करानी चाहिए और दोषी अधिकारियों व ठेकेदार कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना चाहिए.”

विभागीय चुप्पी बरक़रार, जानिए 1972 से अब तक ‘उत्तर कोयल रेत’ का पूरा इतिहास

एक तरफ जहां सोशल मीडिया पर वीडियो के जरिए पुल की गुणवत्ता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जल संसाधन विभाग और संबंधित निर्माण प्रभाग ने इस पूरे मामले पर रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है. विभाग की ओर से अब तक न तो इन दरारों की आधिकारिक पुष्टि की गई है और न ही ग्रामीणों के आरोपों का खंडन किया गया है. अधिकारियों का कहना है कि जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी.

54 वर्षों से अधर में लटकी है यह महत्वाकांक्षी परियोजना: उत्तर कोयल जलाशय परियोजना का इतिहास बेहद पुराना और प्रशासनिक उदासीनता का गवाह रहा है:

परियोजना का मुख्य चरण ऐतिहासिक वर्ष/समय काल मुख्य भौगोलिक व तकनीकी विवरण
परियोजना की शुरुआत वर्ष 1972 तत्कालीन संयुक्त बिहार सरकार द्वारा सूखाग्रस्त पलामू क्षेत्र में सिंचाई के लिए आधारशिला रखी गई.
प्रथम निर्माण काल वर्ष 1993-94 तक बांध और सहायक नहरों का निर्माण कार्य कछुआ गति से चलता रहा, जिसके बाद वित्तीय व अन्य कारणों से काम रुक गया.
बिहार का विभाजन वर्ष 2000 झारखंड अलग राज्य बनने के बाद बांध, बैराज और नहरों का एक बड़ा मुख्य हिस्सा झारखंड के पलामू प्रमंडल में आ गया.
मोहम्मदगंज बैराज 11.89 किलोमीटर मोहम्मदगंज बैराज से निकलने वाली बाईं मुख्य नहर (LMC) पूरी तरह झारखंड के भीतर बहती है.
दाहिनी मुख्य नहर (RMC) 110.44 किलोमीटर कुल लंबाई में से शुरुआती 31.40 किमी झारखंड में तथा शेष 79.04 किमी बिहार के औरंगाबाद और गया जिलों में पड़ता है.

यह परियोजना पलामू प्रमंडल के हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थाई सिंचाई सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से पुनर्जीवित की गई है. ऐसे में ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते इस निर्माणाधीन पुल की तकनीकी कमियों को पूरी पारदर्शिता के साथ दूर नहीं किया गया, तो अरबों रुपये की इस राष्ट्रीय परियोजना की विश्वसनीयता और सुरक्षा हमेशा के लिए दांव पर लग जाएगी.

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