बंगाल में एक युग का अंत: 2011 में ‘परिवर्तन’ लाने वाली ममता बनर्जी 2026 में खुद शिकार; जानें कैसे ढहा TMC का अभेद्य किला

नेशनल

कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए राजनीतिक पतन की एक दर्दनाक दास्तां लेकर आए हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ‘मां-माटी-मानुष’ के नारे के साथ जिस पार्टी ने 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था, वह 2026 में महज 90 सीटों पर सिमट गई है। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 190 से अधिक सीटें जीतकर राज्य में ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन किया है।

अर्श से फर्श तक का सफर: मुख्य कारण

  • वोट शेयर का गणित: आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2016 में जहां भाजपा महज 10% वोट पर थी, वहीं 2021 तक वह 38% और अब 2026 में निर्णायक बढ़त तक पहुंच गई। टीएमसी का वोट बैंक स्थिर रहा, लेकिन विपक्षी मतों के भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण ने सीटों का संतुलन बिगाड़ दिया।

  • भ्रष्टाचार और घोटाले: सारधा, शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन और कोयला तस्करी जैसे आरोपों ने जनता के भरोसे को चोट पहुंचाई। संदेशखाली और आरजी कर कांड जैसे मुद्दों ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया।

  • संगठनात्मक दरार: मुकुल राय और शुभेंदु अधिकारी जैसे ‘चाणक्य’ और जमीनी पकड़ वाले नेताओं का पार्टी छोड़ना टीएमसी के लिए आत्मघाती साबित हुआ। इससे भाजपा को बना-बनाया कैडर और नेटवर्क मिल गया।

  • एंटी-इनकंबेंसी: 15 साल के शासन के बाद स्वाभाविक सत्ता विरोधी लहर को ‘लक्खी भंडार’ जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं भी नहीं रोक सकीं। उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के कई हिस्सों में टीएमसी का क्षेत्रीय आधार पूरी तरह बिखर गया।

2016 में 211 और 2021 में 215 सीटें जीतने वाली ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे कठिन दौर साबित हुआ है। 2021 में नंदीग्राम की हार महज एक संकेत थी, लेकिन 2026 के नतीजों ने बंगाल की सत्ता का नक्शा पूरी तरह बदल दिया है।

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